कुश्ती के आखिरी दांव से पहले गुरु ने अपने ही शागिर्द को हराने का तरीका सिखाया
मिट्टी में बैठा बुढ़ापा
गुरु चंद्रभान सिंह सुबह चार बजे अखाड़े की मिट्टी में बैठे थे, हथेलियों से मिट्टी उठाकर छोड़ रहे थे, जैसे कोई चीज तौल रहे हों। बाईस साल पहले यही मिट्टी उनके घुटनों तक आती थी, जब वह खुद जिले का खिताब जीते थे। अब घुटने जवाब देने लगे थे, और मिट्टी सिर्फ उंगलियों तक रह गई थी।
आज शाम जिला स्तर की आखिरी कुश्ती होनी थी। उनका अपना शागिर्द, रघुवीर, फाइनल में था। सामने वाला पहलवान किसी और अखाड़े का था, नाम बलवंत, जिसे हराने के लिए पिछले दो साल से जिले के आधे पहलवान तरस रहे थे।
रघुवीर अखाड़े के दरवाजे पर आया, अभी-अभी नहाकर, बाल गीले।
"गुरुजी, आज तो जीतना ही है।"
चंद्रभान सिंह ने उसकी तरफ देखा और कुछ नहीं कहा। उनकी चुप्पी रघुवीर को हमेशा परेशान करती थी।
बरसों पुराना एक दांव
दोपहर के अभ्यास के दौरान चंद्रभान सिंह ने इशारे से रघुवीर को अपने पास बुलाकर बाकी लोगों से अलग कर लिया।
बलवंत पूरी तरह अजेय नहीं है। उसके बाएं घुटने की पुरानी चोट अभी भी उसकी परेशानी बनी हुई है। करीब तीन साल पहले एक मुकाबले के दौरान उसे यह चोट लगी थी। तभी से उस पैर पर ज्यादा भार पड़ने पर उसे दिक्कत होती है।”
रघुवीर की आंखें चमकीं। "तो मैं शुरू से ही उस तरफ..."
“ऐसा मत करना,” गुरु ने तुरंत रोकते हुए कहा। “शुरुआत में उस पर टूट मत पड़ना। उसे अपनी कमजोरी का पता है और वह उसे किसी भी हालत में जाहिर नहीं होने देगा। तुम्हें जल्दबाजी के बजाय संयम से काम लेना है। मुकाबले के शुरुआती दो मिनट केवल उसकी हरकतों, चाल और बचाव को समझने में लगाओ।”
जो गुरु ने नहीं बताया
पर एक बात चंद्रभान सिंह ने नहीं बताई। तीन साल पहले वही चोट बलवंत को किसने दी थी, यह सिर्फ वही और एक और आदमी जानते थे। उस मुकाबले में बलवंत का सामना चंद्रभान सिंह के अपने बड़े बेटे मनोहर से हुआ था, जो उस दिन के बाद कभी अखाड़े में नहीं लौटा। मनोहर ने जानबूझकर उस दांव का इस्तेमाल किया था, जिसे अखाड़े की भाषा में "टूटा हुआ दांव" कहा जाता है, क्योंकि वह जोड़ों पर इतना ज्यादा दबाव डालता है कि हड्डी में दरार आ सकती है।
उस दिन के बाद चंद्रभान सिंह ने मनोहर को अखाड़े से निकाल दिया था। बेटे से बोलचाल तक बंद कर दी थी।
आज वही दांव, थोड़े बदले हुए रूप में, वह रघुवीर को सिखाने जा रहे थे।
बेटे की चिट्ठी
शाम होने से पहले डाकिया एक लिफाफा दे गया। चंद्रभान सिंह ने उसे अपनी कोठरी में अकेले बैठकर खोला। मनोहर की लिखावट थी।
"पिताजी, आज अखाड़े में रघुवीर और बलवंत की भिड़ंत होने वाली है। शायद आपको यह जानकर मेरी पुरानी बात याद आ रही होगी और आप मन ही मन मुझे गलत समझ रहे होंगे। इसलिए आज मैं खुद सफाई देना चाहता हूं। उस दिन जो दांव मैंने खेला था, उसके पीछे किसी को नुकसान पहुंचाने या गलत करने की मेरी मंशा बिल्कुल नहीं थी। उस दिन मुझे लगा था कि हारना मतलब सब कुछ खो देना है। आज अगर आप वही सोच रघुवीर को सिखा रहे हैं, तो शायद वह भी वही खो देगा जो मैंने खोया।"
चंद्रभान सिंह ने चिट्ठी मोड़कर रख दी। खिड़की के बाहर शाम का उजाला धीरे-धीरे कम हो रहा था।
अखाड़े में आमने-सामने
मैदान में भीड़ जुट चुकी थी। ढोल बज रहे थे। रघुवीर और बलवंत मिट्टी के बीचों-बीच खड़े थे, दोनों की सांसें तेज, दोनों की नजरें एक-दूसरे पर टिकी।
चंद्रभान सिंह किनारे खड़े थे, हाथ पीठ के पीछे बंधे। उनकी नजर बलवंत के बाएं घुटने पर गई, फिर रघुवीर के चेहरे पर, जो हर पल गुरु की तरफ देख रहा था, इशारे का इंतजार करते हुए।
रेफरी ने सीटी बजाई।
पहला मौका
दो मिनट तक दोनों पहलवान एक-दूसरे को टटोलते रहे। फिर रघुवीर को मौका मिला। बलवंत का बायां पैर थोड़ा फिसला, और रघुवीर उस तरफ झुका।
भीड़ में शोर उठा। चंद्रभान सिंह का दिल तेज धड़कने लगा।
यही वह पल था। एक छोटा सा दबाव, सही कोण पर, और बलवंत का घुटना मुड़ सकता था। जीत पक्की हो जाती। पर साथ ही बलवंत का पूरा करियर वहीं खत्म हो सकता था।
रघुवीर ने गुरु की तरफ एक पल देखा। आंखों में सवाल था।
गुरु की आखिरी आवाज
चंद्रभान सिंह के भीतर दो आवाजें लड़ रही थीं। एक कह रही थी, जीत ले आ, यही तेरी मेहनत का हक है। दूसरी मनोहर की चिट्ठी के शब्दों में बोल रही थी।
"सीधा खेल, रघुवीर!" चंद्रभान सिंह चिल्लाए। आवाज इतनी तेज थी कि अखाड़े के उस कोने तक पहुंच गई। "उस तरफ मत जा!"
रघुवीर एक पल को ठिठका। मौका हाथ से निकल गया। बलवंत ने संभलकर वापस संतुलन बना लिया।
भीड़ में कुछ लोग चिल्लाए, "यह क्या किया, गुरुजी!"
रघुवीर की आंखों में उलझन थी, पर उसने गुरु की आवाज मानी।
आखिरी तीस सेकंड
मुकाबला अब बराबरी पर था। दोनों पहलवान थक चुके थे, मिट्टी में सने, सांसें फूली हुईं। घड़ी में आखिरी तीस सेकंड बचे थे।
इस बार रघुवीर ने अपनी ताकत से एक साफ दांव लगाया, कंधे पर पकड़ बनाकर। कोई चोट वाली जगह नहीं, कोई कमजोरी का फायदा नहीं, सिर्फ बरसों की मेहनत का दांव। बलवंत संभल नहीं पाया और मिट्टी पर गिर गया।
रेफरी ने सीटी बजाई। रघुवीर जीत गया था।
भीड़ का शोर आसमान छूने लगा। पर चंद्रभान सिंह वहीं खड़े रहे, मिट्टी में धंसे पैरों के साथ, आंखों में कुछ और ही बह रहा था।
आखिर जीता कौन?
रघुवीर ने मुकाबला जीता, पर उस दांव से नहीं जो गुरु ने सिखाना चाहा था। चंद्रभान सिंह ने अपने शिष्य को वह दांव सिखाने से रोका, जिससे शायद उन्होंने अपने बेटे को भी बचा लिया होता, अगर वक्त पर रोका होता।
अगर रघुवीर उस कमजोर घुटने पर हमला कर देता, तो क्या जीत उसकी ज्यादा पक्की होती, या वह भी मनोहर की तरह कुछ खो देता? और चंद्रभान सिंह ने आखिरी पल में जो आवाज लगाई, क्या उसमें जीता शिष्य का भविष्य, या जीता एक बाप का पछतावा?
आपको क्या लगता है, आखिर जीता कौन? कमेंट में जरूर बताइए।
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसमें आए सभी पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।
लेखक: Bhanu Pratap Singh
