आखिरी बस से पहले दो प्रेमियों ने एक-दूसरे से एक ही झूठ बोला
जो आदमी आया ही नहीं
रायपुर के पुराने बस अड्डे की घड़ी में साढ़े दस बजे थे और ओमकार अब तक नहीं आया था।
तनुजा साहू ने कंधे का बैग दोनों हाथों से सीने से चिपका रखा था। बैग में दो जोड़ी कपड़े थे, मां की दी हुई एक पतली चांदी की पायल थी, और सबसे नीचे एक सफेद लिफाफा था, जिसे उसने तीन हफ्ते से किसी को नहीं दिखाया था। ओमकार को भी नहीं।
तीन साल में ओमकार एक बार भी देर से नहीं आया था। वह मोबाइल रिपेयर की दुकान वाला लड़का था। हर काम की घड़ी बांधकर चलता था, क्योंकि उसके पास दूसरों की घड़ियों से ज्यादा अपनी घड़ी की चिंता थी।
तनुजा ने फिर फोन मिलाया। "आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अभी बंद है।"
उसने दुपट्टे का कोना उंगली पर लपेटा और खोल दिया। बचपन की आदत थी। डर लगता तो वह यही करती थी।
बंद शटर, खुला दराज
ग्यारह बजे तक उसका सब्र टूट गया। वह रिक्शा लेकर गुढ़ियारी की उस गली में पहुंची जहां ओमकार की दुकान थी।
शटर आधा गिरा हुआ था। नीचे से पीली रोशनी की एक पतली लकीर बाहर आ रही थी। भीतर कोई था।
पहला शक
तनुजा झुककर अंदर गई। काउंटर पर सोल्डरिंग आयरन ठंडा पड़ा था। उसके पास तीन खुले फोन रखे थे और बीच में ओमकार का अपना फोन, जिसकी स्क्रीन जल रही थी। बंद नहीं था, बस साइलेंट पर था।
स्क्रीन पर एक संदेश चमका। भेजने वाली का नाम था "पिंकी दीदी"।
“आज की रात का इंतज़ाम हो चुका है। उसे भनक तक नहीं लगेगी, तू बिल्कुल चिंता मत कर।”
तनुजा के कान में अपनी ही धड़कन की आवाज गूंजने लगी।
कौन नहीं जान पाएगी? और कौन-सी सीट?
उसे याद आया कि पिछले एक महीने से ओमकार कुछ बदला हुआ था। उसकी बात-बात पर हंसने की आदत और बढ़ गई थी। वह हंसी तब आती थी जब वह कोई बात टालना चाहता था। उसने तीन बार पूछा था, "तुम्हारे नतीजे की तारीख क्या थी, तनु?" और तीनों ही बार तनुजा का जवाब एक ही था, “वह अभी तक नहीं पहुँचा है।”
उसकी उंगलियां कांपीं। उसने दराज खींचा।
दराज में रखा कागज
दराज में ग्राहकों की रसीदें थीं, पुराने चार्जर थे, और ऊपर एक मुड़ा हुआ नीला कागज रखा था। बस का टिकट। रायपुर से जगदलपुर, कल सुबह छह बजे की बस, एक यात्री, सीट नंबर चौदह। यात्री का नाम पढ़ते ही तनुजा के हाथ से कागज छूट गया।
नाम उसका अपना था। "तनुजा साहू।"
तभी पीछे से आवाज आई। "तुम यहां क्या कर रही हो?"
दो सच, एक रात
ओमकार दरवाजे पर खड़ा था। उसके हाथ में चाय के दो कुल्हड़ थे और बालों में बारिश की बूंदें। वह हंस रहा था। फिर उसकी नजर नीले टिकट पर पड़ी और हंसी रुक गई।
"यह मेरे लिए है," तनुजा ने टिकट उठाकर कहा। उसकी आवाज अपने ही कानों को अजनबी लगी। "जगदलपुर के लिए। तुम्हें किसने बताया?"
"किसने क्या बताना था," ओमकार ने कुल्हड़ काउंटर पर रखा। "तुम्हारे बैग से लिफाफा गिरा था मेडिकल स्टोर में, उस दिन जब तुम पानी लेने गई थीं। मैंने सिर्फ ऊपर का नाम देखा। राज्य सेवा परीक्षा, चयन सूचना।"
तनुजा कुछ बोल नहीं पाई।
“तनु, तीन हफ्ते बीत चुके हैं। तुमने कुछ नहीं बताया, लेकिन अब मैं सब समझ चुका हूँ।”
"क्या समझ गए?"
"कि तुम्हें डर था। कि मैं रोकूंगा।" उसने नजर चुरा ली। "मैं रोकता भी, शायद। एक हफ्ता मैं यही सोचता रहा कि रोक लूं। फिर सोचा, जो लड़की रात-रात भर जागकर पढ़ी है, उसे एक दुकान वाले के साथ भागने की जगह उसकी कुर्सी पर बैठना चाहिए।"
"तो यह टिकट..."
"जगदलपुर में तुम्हारी जॉइनिंग परसों है। मेरी बहन पिंकी वहीं रहती है। उसी ने तुम्हारे रहने का इंतजाम किया है।" ओमकार ने गहरी सांस ली। "आज रात मैं तुमसे कहने आने वाला था कि मैं नहीं आ सकता। कि मेरा मन बदल गया। तुम नाराज होकर चली जातीं तो आसान रहता।"
लिफाफे का दूसरा हिस्सा
तनुजा हंस पड़ी, पर वह हंसी नहीं थी। उसने बैग खोलकर सफेद लिफाफा निकाला और काउंटर पर रख दिया।
“ओमकार, मैंने भी मन ही मन यही फैसला कर लिया था।”
ओमकार ने लिफाफा खोला। भीतर नियुक्ति पत्र की प्रति थी, और उसके पीछे एक सादा कागज जिस पर तनुजा की लिखावट में एक अधूरा पत्र था। "सेवा में, जिला कार्यालय... मैं व्यक्तिगत कारणों से यह पद स्वीकार करने में असमर्थ हूं..."
नीचे हस्ताक्षर की जगह खाली थी।
“मैं आज रात तुम्हारे साथ अंबिकापुर निकल जाती,” तनुजा ने धीमे स्वर में कहा। “रास्ते में ही तुम्हें बता देती कि मैंने नौकरी छोड़ दी है। तब तक तुम्हारे लिए वापस लौटना संभव नहीं होता।” उसने अपनी आँखों से आँसू पोंछे। “तुमने ही तो कहा था कि दुकान चलाने वाले लड़के को सरकारी नौकरी करने वाली लड़की नहीं मिलती। मैं बस तुम्हारी उस बात को गलत साबित करना चाहती थी।”
कुछ देर दुकान में सिर्फ बाहर की बारिश की आवाज रही।
"हम दोनों ने एक-दूसरे को बचाने के लिए एक-दूसरे से झूठ बोला," ओमकार ने धीरे से कहा।
"और दोनों ने सोचा कि सामने वाला कुछ नहीं जान पाएगा," तनुजा बोली।
सुबह छह बजे की बस
अगली सुबह रायपुर के बस अड्डे पर कोहरा था। पांच बजकर पचास मिनट पर जगदलपुर वाली बस ने हॉर्न दिया।
तनुजा प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। एक हाथ में नीला टिकट था, दूसरे में वह अधूरा पत्र। ओमकार उससे दो कदम दूर था। उसके हाथ खाली थे।
"मैंने रात भर कुछ तय नहीं किया," तनुजा ने कहा। "तुम भी मत करना। आज पहली बार मैं किसी का फैसला अपने हाथ में नहीं ले रही।"
“अब फैसला तुम्हें ही करना है,” ओमकार ने कहा। “इस बार मैं कोई बहाना नहीं बनाऊँगा और न ही यह कहूँगा कि मैं आ नहीं सकता। मैं सिर्फ इतना वादा कर सकता हूँ कि तुम्हारा जो भी निर्णय होगा, मैं तुम्हारा इंतज़ार यहीं करूँगा—चाहे तुम आज लौटो या चार साल बाद।”
कंडक्टर ने आखिरी आवाज लगाई। तनुजा ने टिकट देखा, फिर पत्र देखा। दोनों कागज उसकी उंगलियों में हल्के-हल्के हिल रहे थे।
उसने एक पल ओमकार की आंखों में देखा। फिर किसी ने भी कुछ नहीं कहा।
बस धीरे-धीरे आगे बढ़ी। खिड़की वाली सीट पर एक हाथ बाहर निकला हुआ था। प्लेटफॉर्म पर एक लड़का उस हाथ के साथ-साथ चलने लगा, पहले कदमों से, फिर तेज कदमों से।
कोहरे में अब कुछ साफ नहीं दिख रहा था।
आखिर जीता कौन?
तनुजा ने अपना सपना बचाने की कोशिश की, या ओमकार का सहारा? ओमकार ने तनुजा को आजाद किया, या अपने डर के आगे हार मान ली?
दोनों ने झूठ बोला, और दोनों के झूठ में एक ही सच छिपा था। पर उस सच ने दोनों को आखिर क्या दिया?
अगर तनुजा बस में बैठी रही, तो क्या जीता वह सपना जिसके लिए उसने रातें जगाईं? अगर वह कूदकर उतर गई, तो क्या जीता वह प्यार जिसके लिए उसने सब कुछ दांव पर लगा दिया था? और अगर बस चली गई और ओमकार अकेला खड़ा रह गया, तो क्या उसने सच में कुछ हारा?
आपको क्या लगता है, आखिर जीता कौन? कमेंट में बताइए।
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसमें आए सभी पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।
लेखक: Bhanu Pratap Singh

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