रहस्य • रोमांच • रिश्ते • आखिरी फैसला
हर कहानी के अंत में सवाल — आखिर जीता कौन?
WHOWON STORIES

दो पक्ष। एक कहानी। एक ऐसा अंत जो आपको सोचने पर मजबूर कर दे।

प्यार, दोस्ती, रहस्य, मुकाबला और ऐसे फैसले जिनमें जीतने वाला भी हार सकता है।

कहानी पढ़िए। अंत तक पहुंचिए। फिर तय कीजिए — कौन जीता?

नई रहस्यमयी कहानियां

हर कहानी अलग

Tuesday, October 6, 2026

गंगा आरती की आखिरी घंटी से पहले प्रेमी को मिली गुमनाम धमकी भरी चिट्ठी

शाम की आरती की दीयों की रोशनी में गंगा घाट की सीढ़ियों पर एक-दूसरे से कुछ दूरी पर खड़े एक लड़का और एक लड़की, हाथ में एक मुड़ा हुआ खत

गंगा आरती की आखिरी घंटी से पहले प्रेमी को मिली गुमनाम धमकी भरी चिट्ठी

सीढ़ियों के नीचे छिपा लिफाफा

मेहक तिवारी हर शाम दशाश्वमेध घाट की आरती के ठीक बाद, जब दीयों की आंच सबसे तेज होती और भीड़ सबसे घनी, अपनी पूजा की थाली वहीं एक कोने में रखती और पांच मिनट के लिए गायब हो जाती। उसके पिता, घाट के वरिष्ठ पुजारी रामेश्वर तिवारी, कभी इन पांच मिनटों पर सवाल नहीं उठाते, क्योंकि वह उन्हें "गंगा मैया से अकेले बात करने" का वक्त समझते थे।

असल में मेहक उन पांच मिनटों में सीढ़ियों के सबसे निचले कोने तक उतरती, जहां देवराज निषाद की नाव बंधी रहती थी।

उस शाम, जैसे ही वह नीचे पहुंची, देवराज की जगह नाव में सिर्फ एक मुड़ा हुआ लिफाफा मिला, पत्थर के नीचे दबा हुआ।

अंदर एक धमकी भरा संदेश था:

“आज रात यहां से निकलने की कोशिश मत करना। अगर तुमने ऐसा किया, तो सुबह होने से पहले मेरे पास मौजूद सारी तस्वीरें पूरे घाट की दीवारों पर दिखाई देंगी।”

कोई नाम नहीं था।

भागने की योजना

पिछले तीन महीने से मेहक और देवराज की यही योजना थी। मेहक का विवाह अगले महीने ठेकेदार सूरजभान सिंह के बेटे से तय होने वाला था, एक ऐसा रिश्ता जो मेहक के पिता के लिए घाट की राजनीति में फायदे का सौदा था। सूरजभान सिंह के पास आधे शहर के ठेके थे, और पुजारी परिवार से रिश्ता जुड़ने से उसकी साख और बढ़नी थी।

मेहक और देवराज ने तय किया था, विवाह की बात पक्की होने से एक रात पहले, यानी आज रात, वे दोनों पड़ोसी शहर जाने वाली आखिरी नाव से निकल जाएंगे।

अब यह लिफाफा उस योजना के ठीक बीचोंबीच आ गिरा था।

पहला शक

मेहक का दिल धक-धक करने लगा। उसने इधर-उधर देखा। घाट की सीढ़ियों पर भीड़ अब भी थी, कोई एक चेहरा अलग से पहचान में नहीं आ रहा था।

उसे सबसे पहले सूरजभान सिंह का नाम सूझा। अगर उसे पता चल गया होता, तो वह सीधे धमकी देता, छिपकर खत नहीं भेजता। यह तरीका बहुत नपा-तुला था, बहुत सावधान।

दूसरा नाम दिमाग में आया, उसका अपना बड़ा भाई, विनय। पिछले हफ्ते उसने मेहक को देवराज के साथ पुल के पास देखा था, और उस रात घर में दोनों के बीच कुछ कहा-सुनी भी हुई थी।

पर विनय ऐसा क्यों करेगा?

देवराज कहां है

मेहक ने घाट की हर गली में देवराज को ढूंढा। उसकी नाव वहीं बंधी थी, चप्पू अंदर रखे, पर देवराज कहीं नहीं था। यह उसकी आदत के खिलाफ था। वह हमेशा वक्त से पहले आकर इंतजार करता था।

उसने नाविकों के अड्डे पर पूछा। एक बूढ़े मल्लाह ने बताया, "वह तो शाम को यहीं था, फिर कोई आदमी आया, कुछ बात हुई, और वह उसके साथ चला गया। अंधेरे कपड़ों में था, चेहरा ठीक से नहीं दिखा।"

मेहक की सांसें तेज हो गईं। उसने अपना फोन निकाला। देवराज का नंबर मिलाया। घंटी बजती रही, कोई जवाब नहीं आया।

पुरानी गली में रोशनी

मेहक ने हिम्मत जुटाकर घाट के पीछे की पुरानी गलियों की तरफ कदम बढ़ाए, जहां शाम ढलते ही ज्यादातर दुकानें बंद हो जाती थीं। एक पुरानी हवेली के पास उसे हल्की रोशनी दिखी।

अंदर झांकने पर उसने देवराज को एक कुर्सी पर बैठा देखा, सामने खड़ा था उसका अपना भाई विनय।

मेहक का गला सूख गया। उसने दरवाजा धक्का देकर खोल दिया।

"विनय भैया, यह क्या कर रहे हो?"

भाई की सच्चाई

विनय ने पलटकर देखा। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं, थकान थी।

"बैठ, मेहक। मैं समझाता हूं।"

"तुमने ही खत भेजा था?"

विनय ने सिर हिलाया। "हां, मैंने भेजा था। पर तस्वीरें झूठी धमकी थीं। मेरे पास कोई तस्वीर नहीं है।"

"फिर क्यों?"

जो विनय ने छिपाया था

विनय ने गहरी सांस ली। "तीन दिन पहले मैंने सूरजभान सिंह के आदमियों की बात सुनी। वे जानते हैं, मेहक। उन्हें पता चल गया है कि तुम दोनों मिलते हो। वे आज रात नाव के पास घात लगाए बैठे होंगे, तुम्हें रोकने के लिए नहीं, देवराज को सबक सिखाने के लिए। सूरजभान का बेटा नहीं चाहता कि शादी से पहले शहर में उसकी बेइज्जती की कोई कहानी फैले।"

देवराज ने पहली बार मुंह खोला। "मुझे विनय ने आज शाम रोका। कहा, सीधे नाव पर मत जाना, पहले उससे मिलना। मैं मान गया, क्योंकि उसकी आवाज में सच में डर था।"

"तो चिट्ठी?" मेहक ने पूछा, आंखों में आंसू।

“मैं चाहता था कि धमकी पढ़कर तुम आज रात नाव की तरफ कदम ही न बढ़ाओ,” विनय ने धीरे से कहा। “मुझे पहले से अंदाजा था कि सिर्फ मेरे कहने से तुम अपना फैसला नहीं बदलोगी। इसलिए मैंने सोचा, अगर तुम्हारे मन में डर बैठा दूं, तो शायद तुम वहीं रुक जाओगी।”

फैसले की घड़ी

मेहक कुर्सी पर बैठ गई, हाथ कांप रहे थे। "तो अब क्या करें?"

विनय ने जेब से एक और कागज निकाला, रेलवे का टिकट। "यह असली रास्ता है। नाव पर मत जाना, वहां खतरा है। आज रात की आखिरी ट्रेन से निकल जाओ, स्टेशन के पीछे वाले रास्ते से। मैंने पहले ही टिकट ले लिए हैं।"

"तुम हमारी मदद कर रहे हो?" मेहक को यकीन नहीं हो रहा था।

"मैं तुम्हारा भाई हूं, मेहक। मुझे यह रिश्ता भी पसंद नहीं था, शुरू में। पर एक बेइज्जत करने वाले ठेकेदार के घर भेजने से बेहतर है कि तू उस आदमी के साथ जाए, जिसकी आंखों में तेरे लिए सच्ची फिक्र दिखती है।"

बाहर घड़ी में साढ़े नौ बज रहे थे। आखिरी ट्रेन दस बजकर पांच मिनट पर थी।

स्टेशन की तरफ दौड़

तीनों अंधेरी गलियों से होते हुए स्टेशन की तरफ भागे। रास्ते में एक मोड़ पर मेहक को दूर से सूरजभान सिंह के दो आदमी खड़े दिखे, घाट की तरफ जाने वाले रास्ते पर नजर गड़ाए।

विनय ने इशारे से दोनों को रुकने को कहा और खुद दूसरी तरफ से घूमकर एक पुराना रास्ता दिखाया, जो सीधे प्लेटफॉर्म के पिछले गेट तक जाता था।

ट्रेन की सीटी सुनाई दी। मेहक और देवराज भागते हुए प्लेटफॉर्म पर पहुंचे, ठीक तभी जब ट्रेन धीरे-धीरे सरकने लगी थी।

आखिर जीता कौन?

मेहक ने अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर अपना प्यार चुना। विनय ने अपनी बहन को बचाने के लिए झूठी धमकी का सहारा लिया, एक ऐसा झूठ जो किसी को चोट पहुंचाने के लिए नहीं, बचाने के लिए बोला गया था। और देवराज ने एक अनजान आदमी, विनय पर भरोसा करके अपनी जान का जोखिम उठाया।

अगर ट्रेन छूट जाती, तो क्या जीतता सूरजभान सिंह का रुतबा? अगर मेहक रुक जाती, तो क्या जीतती पिता की इज्जत, या हार जाता उसका अपना सपना? और विनय, जिसने झूठ बोलकर भी सच की रक्षा की, क्या वह जीता या हारा?

घाट पर आरती की आखिरी घंटी बज चुकी थी, और गंगा की धारा अपने उसी पुराने रास्ते पर बहती रही, जैसे उसे पहले से पता हो कि फैसला किसका होगा।

आपको क्या लगता है, आखिर जीता कौन? कमेंट में जरूर बताइए।

यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसमें आए सभी पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।

लेखक: Bhanu Pratap Singh

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

क्या यह हिंदी सस्पेंस लव स्टोरी किसी सच्ची घटना पर आधारित है?

नहीं, यह पूरी तरह काल्पनिक इमोशनल कहानी है। पात्र, घाट, और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।

इस कहानी का सही अंत क्या है?

"आखिर जीता कौन?" सीरीज की तरह इस कहानी का अंत भी जानबूझकर खुला रखा गया है, ताकि पाठक खुद तय कर सकें कि असली जीत किसकी हुई।

Whowon.in पर और कैसी ट्विस्ट एंडिंग वाली प्रेम कहानियां मिलेंगी?

Whowon.in की "दो प्रेमी" कैटेगरी में नियमित रूप से नई सस्पेंस और इमोशन से भरी प्रेम कहानियां जोड़ी जाती हैं, जहां हर कहानी का अंत पाठक के अपने नजरिए पर छोड़ा जाता है।

क्या इस कहानी में कोई असली जगह या व्यक्ति दिखाया गया है?

नहीं, वाराणसी के घाट का जिक्र सिर्फ कहानी के माहौल के लिए काल्पनिक रूप में किया गया है, किसी वास्तविक व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है।

जादू के आखिरी करतब में पानी की टंकी का ताला किसी और ने बदल दिया था

रोशनी से जगमगाते मंच पर पानी से भरी बड़ी कांच की टंकी के दोनों ओर खड़े दो जादूगर, एक की मुट्ठी में चाबी

जादू के आखिरी करतब में पानी की टंकी का ताला किसी और ने बदल दिया था

साठ सेकंड की शर्त

मंच के पीछे अंधेरे में खड़े यश मलिक ने अपनी घड़ी तीसरी बार देखी। सात बजकर अट्ठाईस मिनट। बत्तीस मिनट पर उसे हथकड़ियों में जकड़े, कांच की टंकी के भीतर उतरना था, और साठ सेकंड में बाहर निकलना था। अगर नहीं निकला, तो बाईस साल पुरानी "जादूगर रतन" की उपाधि, गुरु बलदेव आचार्य की दुकान, उनका पूरा सामान—सब कुछ उसके प्रतिद्वंद्वी, करण आचार्य के नाम हो जाता।

करण, गुरु का सगा भतीजा। यश, गुरु का शागिर्द, जिसे बलदेव जी ने बेटे की तरह पाला था।

वसीयत साफ थी: जो आखिरी करतब जीतेगा, पूरी विरासत उसी की।

यश ने हथकड़ियों की जांच की। हर कील, हर कब्जा उसे अपनी हथेलियों जैसा जाना-पहचाना था। उसने बीस बार यही ताला खोला था, आंखें बंद करके भी।

पर आज कुछ अलग लगा। ताले का वजन थोड़ा भारी था।

मंच पर उतरती रोशनी

भीड़ खचाखच भरी थी। शहर के बड़े मेले का आखिरी दिन, और यह मुकाबला पिछले दो हफ्तों से अखबारों की सुर्खी बना हुआ था। "दो जादूगर, एक विरासत, एक टंकी।"

करण पहले से मंच पर था, काले कोट में, हाथ जोड़कर भीड़ का अभिवादन करता हुआ। उसकी नजर एक पल के लिए टंकी के पीछे खड़े सहायक पर गई, और सहायक ने बहुत हल्के से सिर हिलाया।

यश ने यह नहीं देखा। वह अपनी सांसों पर ध्यान लगा रहा था।

एलान हुआ। घड़ी शुरू होने वाली थी।

पहला इशारा

यश को हथकड़ियां पहनाई गईं, फिर जंजीर, फिर उसे टंकी में उतारा गया। ठंडे पानी ने उसे चारों ओर से घेर लिया। भीड़ की आवाज दब गई, सिर्फ दिल की धड़कन कान में गूंजने लगी।

उसने हाथ घुमाए। पहला ताला खुलना था जहां से वह हमेशा शुरू करता था। उंगलियों ने कील टटोली।

कुछ गलत था। कील की जगह बदली हुई थी। यह वही ताला नहीं था जिसे उसने सुबह जांचा था।

सेकंड बीतने लगे। पानी के भीतर से उसे मंच की धुंधली रोशनी और भीड़ के हिलते साए दिखाई दे रहे थे। उसकी छाती में हवा कम पड़ने लगी।

बारह साल पुरानी एक रात

पानी के भीतर, घबराहट के उस पल में, यश को अचानक एक पुरानी रात याद आई। बारह साल पहले, जब वह पहली बार गुरु बलदेव के पास आया था, एक भूखा, बेसहारा लड़का। करण उस वक्त भी वहीं था, पर गुरु ने हमेशा यश को ज्यादा सिखाया, ज्यादा वक्त दिया।

एक रात यश ने करण को गुरु की अलमारी के पास देखा था, कुछ ढूंढता हुआ। अगली सुबह गुरु की सबसे पुरानी और कीमती चाबी का सेट गायब मिला था। करण ने कहा था कि उसने कुछ नहीं देखा।

यश ने तब भी कुछ नहीं कहा था। आज उस खामोशी की कीमत शायद उसकी जान से चुकानी पड़ने वाली थी।

मंच के बाहर की उथल-पुथल

बाहर, पैंतीस सेकंड बीत चुके थे। भीड़ में फुसफुसाहट शुरू हो गई। गुरु बलदेव की बेटी, शालिनी, जो मंच किनारे खड़ी थी, उसकी नजर करण के चेहरे पर टिकी। करण का चेहरा सामान्य था, पर उसकी मुट्ठियां बहुत कसकर बंद थीं।

कई साल पहले शालिनी की नजर अपने पिता की पुरानी डायरी में लिखी एक पंक्ति पर पड़ी थी। उसमें लिखा था, “दुनिया में ऐसा कोई ताला नहीं, जिसका कोई दूसरा रास्ता न हो। हर ताले की एक साथी चाबी होती है। लेकिन एक सच्चे जादूगर की असली काबिलियत ताला खोलने में नहीं, बल्कि यह समझने में है कि सामने वाले का विश्वास कितना मजबूत है।”

उसने करण के पास जाकर धीरे से पूछा, "तुमने ताला छुआ था?"

करण ने जवाब नहीं दिया।

सहायक की चोरी नजर

शालिनी ने टंकी के पीछे खड़े सहायक को देखा, जिसकी नजरें बार-बार करण की तरफ जा रही थीं। वह सहायक, मोहन, पिछले महीने ही करण की सिफारिश पर काम पर रखा गया था।

शालिनी तेजी से पीछे गई और मोहन का हाथ पकड़ लिया। उसकी जेब से एक छोटा सा औजार गिरा, वैसा ही जैसा तालों के पुर्जे बदलने में इस्तेमाल होता है।

"तुमने ताला बदला?" उसने पूछा।

मोहन का चेहरा सफेद पड़ गया। "मुझे बस कहा गया था कि नया ताला लगाना ज्यादा सुरक्षित रहेगा, पुराना ढीला पड़ गया था..."

"किसने कहा?"

मोहन ने करण की तरफ देखा। उसने जवाब नहीं दिया, पर उसकी आंखों ने दे दिया।

पचास सेकंड

टंकी के भीतर यश की उंगलियां अब भी ताले से जूझ रही थीं। सांस की कमी से आंखों के आगे धुंधलापन छाने लगा था। उसने खुद को याद दिलाया, जो गुरु ने सिखाया था, घबराहट सबसे बड़ा दुश्मन है।

उसने नए ताले को टटोलना बंद किया और इसके बजाय महसूस करने लगा कि यह ताला किस तरह का है। बलदेव जी के पुराने संग्रह में एक खास तरह का ताला था, जिसे वह खुद यश को दिखा चुके थे, बरसों पहले, सिर्फ एक बार। उसकी बनावट अलग थी, पर तरकीब वही पुरानी थी, बस एक नई दिशा में घुमानी थी।

यश ने आखिरी हिम्मत जुटाई।

टंकी से बाहर

छप्पन सेकंड पर ताला खुला। यश ने जंजीरें उतारीं और पानी से बाहर उछला, हांफता हुआ, भीड़ की तालियों के बीच।

मंच के पीछे उस वक्त शालिनी करण का हाथ पकड़े खड़ी थी, मोहन पास में सिर झुकाए।

यश सीधा खड़ा होते ही करण की तरफ मुड़ा। उसकी सांस अब भी भारी थी।

"तुमने ताला बदला था?"

करण की आंखें नम हो गईं। "मैंने नहीं चाहा था कि तुम डूब जाओ, यश। बस... मैं चाहता था कि तुम्हें पता चले, मुश्किल कैसी लगती है। तुमने हमेशा सब आसानी से सीख लिया। मुझे बरसों लगे, फिर भी गुरुजी की नजर में मैं कभी बराबर नहीं आया। मैंने सिर्फ ताला थोड़ा सख्त करवाया था, ताकि तुम्हें थोड़ी देर लगे। मोहन से कहा था साठ सेकंड के अंदर तुम्हें बाहर निकालने के लिए तैयार रहना, अगर कुछ गलत हो।"

मोहन ने सिर हिलाया। "मेरे हाथ में आपातकालीन चाबी थी, टंकी के पीछे। अगर पचपन सेकंड तक ताला नहीं खुलता, मुझे टंकी खोलनी थी।"

आखिर जीता कौन?

वसीयत के मुताबिक, यश ने साठ सेकंड के अंदर करतब पूरा किया, इसलिए नियम से वही विजेता था। पर उस मंच पर, पानी से भीगा खड़ा, यश को अब यकीन नहीं था कि असली परीक्षा वह थी जो टंकी के भीतर हुई, या वह जो टंकी के बाहर अभी हो रही थी।

करण ने धोखा किया, यह सच है। पर उसने यश की जान बचाने का इंतजाम भी किया था, भले ही अपने ही धोखे से बचाने के लिए। क्या करण हारा, क्योंकि उसकी चाल पकड़ी गई? या जीता, क्योंकि आखिरी पल में उसने यश को बचाने का रास्ता रखा?

और यश, जिसने बारह साल पुराना एक राज आज तक छुपाए रखा, क्या वह सच में जीता, या उसने भी कहीं न कहीं चुप्पी की वही गलती दोहराई, जो उसे आज मौत के करीब ले गई?

गुरु बलदेव की वसीयत ने एक विजेता चुना। पर मंच पर खड़े तीन लोगों के बीच, शायद जीत-हार का हिसाब इतना आसान नहीं था।

आपको क्या लगता है, आखिर जीता कौन? कमेंट में जरूर बताइए।

यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसमें आए सभी पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।

लेखक: Bhanu Pratap Singh

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

क्या यह कहानी किसी सच्ची घटना पर आधारित है?

नहीं, यह पूरी तरह काल्पनिक कहानी है। इसमें आए सभी पात्र, जगहें और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं, किसी वास्तविक व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है।

"आखिर जीता कौन?" सीरीज की कहानियों का सही अंत क्या होता है?

इस सीरीज की हर कहानी जानबूझकर खुले अंत के साथ खत्म होती है, ताकि पाठक खुद अपनी समझ से तय कर सकें कि असली विजेता कौन था। कोई एक "सही जवाब" नहीं दिया जाता।

क्या इस तरह के जल-मुक्ति (water escape) करतब असल में खतरनाक होते हैं?

मंच पर होने वाले पानी से जुड़े जादुई करतब सुरक्षा उपायों और वर्षों की ट्रेनिंग के साथ किए जाते हैं। यह कहानी मनोरंजन के लिए लिखी गई है; इसे किसी वास्तविक करतब की तकनीकी जानकारी या सलाह के रूप में न लें।

Whowon.in पर "कौन जीता?" कैटेगरी की नई कहानियां कब आती हैं?

नई कहानियां नियमित रूप से जोड़ी जाती हैं। ताजा कहानियों के लिए इस कैटेगरी को समय-समय पर देखते रहें।

Saturday, October 3, 2026

कुश्ती के आखिरी दांव से पहले गुरु ने अपने ही शागिर्द को हराने का तरीका सिखाया

शाम के धुंधलके में मिट्टी के अखाड़े के बीचों-बीच कुश्ती की मुद्रा में खड़े एक बुजुर्ग पहलवान और एक जवान पहलवान

कुश्ती के आखिरी दांव से पहले गुरु ने अपने ही शागिर्द को हराने का तरीका सिखाया

मिट्टी में बैठा बुढ़ापा

गुरु चंद्रभान सिंह सुबह चार बजे अखाड़े की मिट्टी में बैठे थे, हथेलियों से मिट्टी उठाकर छोड़ रहे थे, जैसे कोई चीज तौल रहे हों। बाईस साल पहले यही मिट्टी उनके घुटनों तक आती थी, जब वह खुद जिले का खिताब जीते थे। अब घुटने जवाब देने लगे थे, और मिट्टी सिर्फ उंगलियों तक रह गई थी।

आज शाम जिला स्तर की आखिरी कुश्ती होनी थी। उनका अपना शागिर्द, रघुवीर, फाइनल में था। सामने वाला पहलवान किसी और अखाड़े का था, नाम बलवंत, जिसे हराने के लिए पिछले दो साल से जिले के आधे पहलवान तरस रहे थे।

रघुवीर अखाड़े के दरवाजे पर आया, अभी-अभी नहाकर, बाल गीले।

"गुरुजी, आज तो जीतना ही है।"

चंद्रभान सिंह ने उसकी तरफ देखा और कुछ नहीं कहा। उनकी चुप्पी रघुवीर को हमेशा परेशान करती थी।

बरसों पुराना एक दांव

दोपहर के अभ्यास के दौरान चंद्रभान सिंह ने इशारे से रघुवीर को अपने पास बुलाकर बाकी लोगों से अलग कर लिया।

बलवंत पूरी तरह अजेय नहीं है। उसके बाएं घुटने की पुरानी चोट अभी भी उसकी परेशानी बनी हुई है। करीब तीन साल पहले एक मुकाबले के दौरान उसे यह चोट लगी थी। तभी से उस पैर पर ज्यादा भार पड़ने पर उसे दिक्कत होती है।”

रघुवीर की आंखें चमकीं। "तो मैं शुरू से ही उस तरफ..."

“ऐसा मत करना,” गुरु ने तुरंत रोकते हुए कहा। “शुरुआत में उस पर टूट मत पड़ना। उसे अपनी कमजोरी का पता है और वह उसे किसी भी हालत में जाहिर नहीं होने देगा। तुम्हें जल्दबाजी के बजाय संयम से काम लेना है। मुकाबले के शुरुआती दो मिनट केवल उसकी हरकतों, चाल और बचाव को समझने में लगाओ।”

जो गुरु ने नहीं बताया

पर एक बात चंद्रभान सिंह ने नहीं बताई। तीन साल पहले वही चोट बलवंत को किसने दी थी, यह सिर्फ वही और एक और आदमी जानते थे। उस मुकाबले में बलवंत का सामना चंद्रभान सिंह के अपने बड़े बेटे मनोहर से हुआ था, जो उस दिन के बाद कभी अखाड़े में नहीं लौटा। मनोहर ने जानबूझकर उस दांव का इस्तेमाल किया था, जिसे अखाड़े की भाषा में "टूटा हुआ दांव" कहा जाता है, क्योंकि वह जोड़ों पर इतना ज्यादा दबाव डालता है कि हड्डी में दरार आ सकती है।

उस दिन के बाद चंद्रभान सिंह ने मनोहर को अखाड़े से निकाल दिया था। बेटे से बोलचाल तक बंद कर दी थी।

आज वही दांव, थोड़े बदले हुए रूप में, वह रघुवीर को सिखाने जा रहे थे।

बेटे की चिट्ठी

शाम होने से पहले डाकिया एक लिफाफा दे गया। चंद्रभान सिंह ने उसे अपनी कोठरी में अकेले बैठकर खोला। मनोहर की लिखावट थी।

"पिताजी, आज अखाड़े में रघुवीर और बलवंत की भिड़ंत होने वाली है। शायद आपको यह जानकर मेरी पुरानी बात याद आ रही होगी और आप मन ही मन मुझे गलत समझ रहे होंगे। इसलिए आज मैं खुद सफाई देना चाहता हूं। उस दिन जो दांव मैंने खेला था, उसके पीछे किसी को नुकसान पहुंचाने या गलत करने की मेरी मंशा बिल्कुल नहीं थी। उस दिन मुझे लगा था कि हारना मतलब सब कुछ खो देना है। आज अगर आप वही सोच रघुवीर को सिखा रहे हैं, तो शायद वह भी वही खो देगा जो मैंने खोया।"

चंद्रभान सिंह ने चिट्ठी मोड़कर रख दी। खिड़की के बाहर शाम का उजाला धीरे-धीरे कम हो रहा था।

अखाड़े में आमने-सामने

मैदान में भीड़ जुट चुकी थी। ढोल बज रहे थे। रघुवीर और बलवंत मिट्टी के बीचों-बीच खड़े थे, दोनों की सांसें तेज, दोनों की नजरें एक-दूसरे पर टिकी।

चंद्रभान सिंह किनारे खड़े थे, हाथ पीठ के पीछे बंधे। उनकी नजर बलवंत के बाएं घुटने पर गई, फिर रघुवीर के चेहरे पर, जो हर पल गुरु की तरफ देख रहा था, इशारे का इंतजार करते हुए।

रेफरी ने सीटी बजाई।

पहला मौका

दो मिनट तक दोनों पहलवान एक-दूसरे को टटोलते रहे। फिर रघुवीर को मौका मिला। बलवंत का बायां पैर थोड़ा फिसला, और रघुवीर उस तरफ झुका।

भीड़ में शोर उठा। चंद्रभान सिंह का दिल तेज धड़कने लगा।

यही वह पल था। एक छोटा सा दबाव, सही कोण पर, और बलवंत का घुटना मुड़ सकता था। जीत पक्की हो जाती। पर साथ ही बलवंत का पूरा करियर वहीं खत्म हो सकता था।

रघुवीर ने गुरु की तरफ एक पल देखा। आंखों में सवाल था।

गुरु की आखिरी आवाज

चंद्रभान सिंह के भीतर दो आवाजें लड़ रही थीं। एक कह रही थी, जीत ले आ, यही तेरी मेहनत का हक है। दूसरी मनोहर की चिट्ठी के शब्दों में बोल रही थी।

"सीधा खेल, रघुवीर!" चंद्रभान सिंह चिल्लाए। आवाज इतनी तेज थी कि अखाड़े के उस कोने तक पहुंच गई। "उस तरफ मत जा!"

रघुवीर एक पल को ठिठका। मौका हाथ से निकल गया। बलवंत ने संभलकर वापस संतुलन बना लिया।

भीड़ में कुछ लोग चिल्लाए, "यह क्या किया, गुरुजी!"

रघुवीर की आंखों में उलझन थी, पर उसने गुरु की आवाज मानी।

आखिरी तीस सेकंड

मुकाबला अब बराबरी पर था। दोनों पहलवान थक चुके थे, मिट्टी में सने, सांसें फूली हुईं। घड़ी में आखिरी तीस सेकंड बचे थे।

इस बार रघुवीर ने अपनी ताकत से एक साफ दांव लगाया, कंधे पर पकड़ बनाकर। कोई चोट वाली जगह नहीं, कोई कमजोरी का फायदा नहीं, सिर्फ बरसों की मेहनत का दांव। बलवंत संभल नहीं पाया और मिट्टी पर गिर गया।

रेफरी ने सीटी बजाई। रघुवीर जीत गया था।

भीड़ का शोर आसमान छूने लगा। पर चंद्रभान सिंह वहीं खड़े रहे, मिट्टी में धंसे पैरों के साथ, आंखों में कुछ और ही बह रहा था।

आखिर जीता कौन?

रघुवीर ने मुकाबला जीता, पर उस दांव से नहीं जो गुरु ने सिखाना चाहा था। चंद्रभान सिंह ने अपने शिष्य को वह दांव सिखाने से रोका, जिससे शायद उन्होंने अपने बेटे को भी बचा लिया होता, अगर वक्त पर रोका होता।

अगर रघुवीर उस कमजोर घुटने पर हमला कर देता, तो क्या जीत उसकी ज्यादा पक्की होती, या वह भी मनोहर की तरह कुछ खो देता? और चंद्रभान सिंह ने आखिरी पल में जो आवाज लगाई, क्या उसमें जीता शिष्य का भविष्य, या जीता एक बाप का पछतावा?

आपको क्या लगता है, आखिर जीता कौन? कमेंट में जरूर बताइए।

यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसमें आए सभी पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।

लेखक: Bhanu Pratap Singh

गांव वालों ने जिसे मरा मान लिया था, वह अपने ही घर की दहलीज पर लौट आया

शाम के धुंधलके में मिट्टी के घर की दहलीज पर खड़ा एक दुबला आदमी, दरवाजे के पीछे से झांकती एक बुजुर्ग औरत

गांव वालों ने जिसे मरा मान लिया था, वह अपने ही घर की दहलीज पर लौट आया

तेरहवीं के ग्यारह महीने बाद

कुसुमी देवी रोज सुबह चूल्हे में आग जलाने से पहले बाहर के ओटले पर एक लोटा पानी रख देती थीं। यह आदत उन्होंने तब से नहीं छोड़ी थी जब से महानदी की बाढ़ उनके बेटे रामलखन को बहा ले गई थी। गांव वालों ने उसी साल तेरहवीं कर दी थी। कुसुमी देवी ने नहीं की।

उस शाम, जब आसमान में बादल कम थे और हवा में धान कटने की गंध थी, ओटले पर रखा लोटा अचानक गिर गया। कुसुमी देवी भीतर से दौड़ी आईं। दहलीज पर एक आदमी खड़ा था, मैला कुर्ता पहने, पैर नंगे और सूजे हुए, और चेहरा इतना दुबला कि पहचानना मुश्किल था।

"माई," उसने कहा।

एक ही शब्द में कुसुमी देवी की टांगें जवाब दे गईं।

गांव का फैसला

खबर आग की तरह फैली। आधे गांव पड़ोस के खेत से दौड़े आए। बरगद के नीचे पंचायत बुलाई गई, जहां मुखिया गणेशराम यादव पहले से बैठे थे।

"ग्यारह महीने कहां थे?" गणेशराम ने पूछा।

आदमी ने धीरे-धीरे बताया। बाढ़ में बहते हुए वह पड़ोसी जिले के किसी गांव के पास किनारे पर अटक गया था। सिर में चोट लगी थी। एक मछुआरे परिवार ने उसे उठाया, कई महीने उसे अपना नाम तक याद नहीं रहा। धीरे-धीरे याद लौटी, फिर पैसे जोड़कर लौटने का रास्ता निकाला।

पहला शक

भीड़ में से रामलखन के बचपन के दोस्त सुखदेव ने आगे बढ़कर उसका कंधा पकड़ा, फिर अचानक हाथ खींच लिया।

"रामलखन के बाएं कान के पीछे एक निशान था," सुखदेव बोला। "बचपन में कुएं से गिरा था।"

आदमी ने अपना कान दिखाया। वहां कोई निशान नहीं था।

भीड़ में सरसराहट हुई। गणेशराम यादव की भौंहें तन गईं।

"हो सकता है निशान मिट गया हो," कुसुमी देवी ने जल्दी से कहा। "ग्यारह साल पुराना निशान था।"

"या हो सकता है यह रामलखन न हो," गणेशराम ने कहा।

जमीन का सवाल

रामलखन की मौत के बाद उसके हिस्से की ढाई बीघा जमीन उसके चचेरे भाई विनोद के नाम हो चुकी थी। पंचायत का वही फैसला था, क्योंकि कुसुमी देवी अकेली उस जमीन को संभाल नहीं सकती थीं।

विनोद भीड़ के पीछे खड़ा था, चेहरे पर कोई भाव नहीं। जब उसकी नजर उस आदमी से मिली, उसने नजरें झुका लीं।

"अगर यह सच में रामलखन है," गणेशराम बोले, "तो जमीन वापस मांगेगा।"

भीड़ में किसी ने फुसफुसाया, "या कोई और है जिसे विनोद की जमीन चाहिए।"

रात का सवाल-जवाब

रात को पंचायत घर में आदमी को बिठाया गया। गांव के बुजुर्गों ने बारी-बारी से सवाल पूछे। उसकी मां का नाम पूछा, उसने सही बताया। उसकी शादी की बात चल रही थी किससे, यह भी याद था। पर जब पूछा गया कि स्कूल में उसका पक्का दोस्त कौन था, तो वह कुछ देर चुप रहा।

"सुखदेव," उसने आखिर कहा।

सुखदेव खुद वहीं बैठा था। "यह तो कोई भी बता सकता है, गांव में सब जानते हैं कि हम दोनों साथ पढ़े।"

आदमी ने नजरें नीचे कर लीं। “सिर पर चोट लगी थी, इसलिए बीती कुछ बातें ठीक से याद नहीं आ रहीं। लेकिन माई को देखते ही मेरे मन में जरा भी संशय नहीं रहा। मैंने उन्हें तुरंत पहचान लिया।”

कुसुमी देवी उसके पास बैठी थीं, उसका हाथ पकड़े हुए। उन्होंने किसी से नजर नहीं मिलाई।

विनोद की रात

उस रात विनोद अपने कमरे में अकेला बैठा रहा। उसकी पत्नी ने दो बार पूछा कि क्या हुआ है, उसने जवाब नहीं दिया।

सुबह होने से पहले वह कुसुमी देवी के घर गया। आदमी बाहर आंगन में सो रहा था, एक पुरानी चादर ओढ़े।

विनोद देर तक उसे देखता रहा। फिर उसने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली, जिसमें वह और रामलखन दोनों किशोर उम्र में खड़े थे, एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखे।

उसने तस्वीर में रामलखन के कान के पीछे देखा। तस्वीर धुंधली थी, पर निशान जैसा कुछ दिखता था।

वह बहुत देर तक वहीं खड़ा रहा। फिर बिना कुछ कहे लौट गया।

पंचायत का आखिरी दिन

तीसरे दिन गांव में फिर पंचायत बैठी। इस बार विनोद भी आगे आकर बैठा।

"मैं कुछ कहना चाहता हूं," उसने कहा। उसकी आवाज कांप रही थी। "जमीन मेरे नाम है, कानूनी तौर पर। चाहूं तो मना कर सकता हूं। कोई मुझे मजबूर नहीं कर सकता।"

भीड़ में सन्नाटा छा गया।

"लेकिन कल रात जब मैंने उसे सोते हुए देखा, तो उसके चेहरे की वो लकीरें बिल्कुल रामलखन जैसी ही थीं—वही शिकन जो गहरी चिंता में सोते वक्त उसके चेहरे पर आ जाती थी। गंगा मैया की कसम, मैं रत्ती भर भी झूठ नहीं बोल रही हूँ। मेरी बुद्धि तो नहीं जानती कि यह सचमुच हमारा रामलखन है या कोई और। पर मेरा दिल गवाही देता है कि अगर यह वो नहीं भी है ना, तो भी इसे माई के आंचल की उतनी ही तड़प है, जितनी माई की सूनी गोद को उसकी।"

आदमी ने सिर उठाकर विनोद को देखा। उसकी आंखों में कुछ चमका, जिसे पूरी भीड़ ने देखा, पर कोई नाम नहीं दे पाया।

"जमीन की बात बाद में होगी," गणेशराम यादव ने कहा। "पहले यह तय हो कि यह कौन है।"

आखिर जीता कौन?

कुसुमी देवी ने उसे बेटा मान लिया, बिना सबूत मांगे। गांव ने सबूत मांगा और नहीं पा सका। विनोद ने जमीन से बड़ा कुछ मान लिया, बिना यह जाने कि सामने वाला सच में उसका भाई है या नहीं।

अगर वह आदमी सच में रामलखन है, तो क्या जीती वह मां जिसने ग्यारह महीने उम्मीद नहीं छोड़ी? अगर वह कोई और है, तो क्या जीता वह इंसान जिसे एक मां मिल गई, और वह मां जिसे फिर एक सहारा मिल गया? और अगर सच कभी सामने न आए, तो क्या हार किसी की हुई, या जीत सबकी?

आपको क्या लगता है, आखिर जीता कौन? कमेंट में जरूर बताइए।

यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसमें आए सभी पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।

लेखक: Bhanu Pratap Singh

Friday, October 2, 2026

सौदे की सुबह पुरानी विधि की डायरी गायब थी, और चाबी सिर्फ दो दोस्तों के पास थी

सुबह के हल्के उजाले में जलेबी की छोटी दुकान की कढ़ाई के पास खड़े दो दोस्त, बीच में एक खाली जगह

सौदे की सुबह पुरानी विधि की डायरी गायब थी, और चाबी सिर्फ दो दोस्तों के पास थी

खाली जगह पर रखा चाय का गिलास

सुबह चार बजे दीपक वर्मा ने दुकान का ताला खोला और सीधे चूल्हे के पास वाली अलमारी की ओर गया। लाल जिल्द वाली डायरी हर रात वहीं रखी रहती थी, पुराने मर्तबान के पीछे। आज वहां सिर्फ गोल निशान था, जहां मर्तबान का तला धूल में बैठा था।

दीपक ने अलमारी के हर खाने में हाथ डाला। फिर पीछे की दीवार टटोली। फिर बैठ गया।

उसी डायरी में चालीस साल पुरानी जलेबी की विधि लिखी थी। उसी विधि के सौदे के कागज पर आज सुबह दस बजे दस्तखत होने थे। एक बड़ी मिठाई कंपनी का आदमी नौ बजे दुकान पर आने वाला था।

ताला टूटा नहीं था। खिड़की की जाली अपनी जगह थी। दुकान की चाबियां दो ही थीं। एक उसकी जेब में थी, और दूसरी इरफान के पास।

दीपक ने घबराहट में फोन उठाया और इरफान का नंबर डायल किया। कुछ ही देर बाद दूसरी तरफ से उनींदी आवाज सुनाई दी, “इतनी सुबह फोन क्यों किया? सब ठीक तो है?”

"जल्दी आ," दीपक ने कहा। "डायरी नहीं है।"

फोन के उस पार कुछ पल खामोशी रही। फिर इरफान बोला, "आ रहा हूं।"

पुराने दोस्त, नया सन्नाटा

इरफान अंसारी पैंतालीस मिनट बाद पहुंचा। बाल बिखरे थे, कमीज की एक बांह उल्टी मुड़ी हुई थी। वह सीधा अलमारी तक गया और खाली गोले को देर तक देखता रहा।

पहली पूछताछ

"तूने रात को ताला लगाया था?" इरफान ने पूछा।

"हाँ, मैंने ही लगाया था। ठीक आठ बजे। तुम खुद भी तो वहीं मौजूद थे।"

"लेकिन मैं तो साढ़े आठ बजे वहाँ से निकला था। मेरे जाने के बाद क्या हुआ?"

"उसके बाद मैं सीधा घर गया। अम्मा से पूछ ले।" दीपक की आवाज ऊंची हो गई। "पर मुझे यह बता, इरफान, चाबी तेरे पास भी तो है।"

इरफान ने उसकी ओर देखा। वह कम बोलने वाला आदमी था। गुस्सा आता तो और चुप हो जाता, और उसकी यही चुप्पी दीपक को हमेशा से सबसे ज्यादा चुभती थी।

"तू मुझ पर शक कर रहा है।"

"मैं सिर्फ पूछ रहा हूं।"

"हद है यार! हमारी बीस साल पुरानी दोस्ती के बाद भी आज तुझे मुझ पर यह शक हो रहा है?"

बाहर गली में पहली साइकिल की घंटी बजी। दुकान के भीतर दोनों आदमी एक-दूसरे के सामने खड़े थे, और बीच में चूल्हे की ठंडी राख थी।

जो दीपक ने देखा

दीपक की नजर इरफान के हाथों पर गई। दाएं हाथ की उंगलियों पर हल्की चिकनाई थी, जैसे किसी ने अभी-अभी तेल लगाया हो। दीपक को याद आया कि पिछले हफ्ते ही पीछे के दरवाजे की कुंडी चरमराने लगी थी। उसने उसे ठीक करने की बात कही थी, पर इरफान ने कहा था, "मैं देख लूंगा।"

दीपक ने कुंडी को छुआ। उंगली पर काला तेल चढ़ गया। ताजा तेल।

"कुंडी में तेल किसने डाला?"

इरफान ने एक पल को आंखें बंद कीं। "मैंने। कल शाम।"

"कल शाम तो वह चरमरा रही थी, इरफान। मैंने खुद सुना था।"

"तो मैंने रात को डाला होगा।" उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि सुनाई मुश्किल से दी।

सौदे से पहले की सच्चाई

आठ बज चुके थे। गली में दुकानें खुलने लगी थीं। दीपक ने चाय के दो गिलास भरे, पर किसी ने उन्हें छुआ नहीं।

"इरफान," उसने कहा, "तू नहीं चाहता था कि यह सौदा हो।"

"हां, नहीं चाहता था।"

"तूने कहा था तू मान गया।"

"मैंने कहा था कि तुझे जो ठीक लगे, कर। मान जाना और राजी होना अलग बातें हैं, दीपक।" इरफान ने पहली बार उसकी आंखों में सीधे देखा। "यह विधि मेरे अब्बा की लिखाई में है। उन्होंने चालीस साल कढ़ाई के सामने खड़े होकर यह स्वाद बनाया था। तू इसे कागज पर बिकने वाली चीज समझता है।"

"क्योंकि मेरे पास तेरे जैसी भावनाओं का बैंक नहीं है," दीपक ने तीखा जवाब दिया। "मेरे ऊपर छह लाख का कर्ज है। मेरी बहन की शादी अगले साल है। यह दुकान दो आदमियों का पेट भरती है, पर तीन परिवारों का बोझ नहीं उठाती।"

"तो तूने मुझे बताया क्यों नहीं?"

"क्या बताता?"

"कि तूने पहले ही कंपनी से बयाना ले लिया है।"

दीपक का चेहरा सफेद पड़ गया।

कमीज की जेब का कागज

"तेईस हजार का," इरफान ने कहा। उसकी आवाज अब भी शांत थी। "बैंक की पर्ची तेरी पुरानी कमीज में थी, जो पिछले सोमवार इस्त्री के लिए मेरे घर आई थी। मैंने तब कुछ नहीं कहा। सोचा, तू खुद बताएगा। तू नहीं बताएगा, यह मुझे कल रात समझ आया।"

"तो तूने डायरी उठा ली?"

इरफान चुप रहा।

"जवाब दे!"

"मैंने उठाई है," इरफान ने कहा।

चूल्हे की राख में कुछ हिला। शायद हवा थी।

डायरी कहां है

"कहां है वह?" दीपक की आवाज फट गई। उसने इरफान का कॉलर पकड़ लिया। इरफान ने हटाया नहीं, बस उसकी आंखों में देखता रहा।

“अगर मुझे खत्म करना ही है, तो कर दे,” उसने शांत स्वर में कहा। “डायरी तुझे वापस मिल जाएगी। लेकिन उससे पहले मेरी एक बात सुन ले। मैं रात में डायरी चुराकर छिपाने नहीं गया था। मैं तो उसे पढ़ना चाहता था—अब्बा के अपने हाथों से लिखे उन शब्दों को, बस एक आखिरी बार।”

दीपक की पकड़ अचानक कमजोर पड़ गई।

“डायरी पढ़ते-पढ़ते मैं उसके आखिरी हिस्से तक पहुंच गया। वहां एक ऐसी बात दर्ज थी, जिसके बारे में हम दोनों को कभी पता ही नहीं चला। वह पन्ना जिल्द के अंदर चिपका हुआ था, इसलिए हमारी नजर उस पर कभी नहीं पड़ी। रात में मैंने बड़ी सावधानी से उसे अलग किया और खोलकर पढ़ा।”

इरफान ने अपनी जेब से लाल जिल्द वाली डायरी निकाली। उसके कोने घिसे हुए थे, और जिल्द के भीतर का चिपका हुआ पन्ना हल्का फटकर उठा हुआ था।

"पढ़," उसने कहा।

दीपक ने डायरी हाथ में ली। आखिरी पन्ने पर पतले नीले अक्षर थे, जो कई साल की स्याही में धुंधले पड़ चुके थे।

"बेचना पड़े तो बेच देना, पर किसी एक के दस्तखत से मत बेचना। जिस दिन विधि दो हाथों की जगह एक हाथ से बिके, उस दिन समझ लेना कि स्वाद गया।"

दीपक ने उसे दो बार पढ़ा। उसके होंठ सूख गए।

“आखिर यह बात लिखी कब गई थी?”

इरफान ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “अब्बा को पहले से अंदाजा था कि किसी दिन हम दोनों के सामने यही सवाल खड़ा होगा। हो सकता है, उन्होंने तेरे पापा से भी उस वक्त यही बात कही हो।”

नौ बजे का मेहमान

नौ बजते ही गली में कार का हॉर्न सुनाई दिया। कंपनी का आदमी, ब्रीफकेस और मुस्कान लिए, दुकान की दहलीज पर खड़ा था।

"नमस्ते भाई साहब! सब तैयार?"

दोनों दोस्त एक साथ उसकी ओर मुड़े। चूल्हे के पास रखी मेज पर कागज बिछे थे। दीपक के हाथ में डायरी थी, इरफान के हाथ में कलम।

"बयाना तो हम ले ही चुके हैं," कंपनी वाले ने कहा, "आज बस दस्तखत हो जाएं।"

दीपक ने इरफान की ओर देखा। इरफान की उंगलियां कलम पर थीं, पर उसने उसे आगे नहीं बढ़ाया।

"दो दस्तखत चाहिए, दीपक," उसने धीमे से कहा। "यह तेरा कर्ज है, मेरी अब्बा की विरासत है, और हम दोनों की दुकान है। मैं तुझे मना नहीं करूंगा। पर मैं तेरे लिए भी सही नहीं करूंगा, अगर तू मुझे बिना बताए यह सौदा कर ले।"

दीपक का मन अब भी भीतर से दो हिस्सों में बंटा था। एक हिस्सा छह लाख के कर्ज को गिन रहा था। दूसरा हिस्सा अपने पिता की पुरानी साइकिल को याद कर रहा था, जो हर सुबह इसी दुकान के बाहर खड़ी होती थी।

उसने कलम उठाई। कागज पर कलम की नोक टिकी। बाहर गली में किसी ने कढ़ाई में पहली जलेबी डाली। पुराने तेल की महक दुकान में भर गई।

आखिर जीता कौन?

इरफान ने डायरी चुराई, यह सच है। पर दीपक ने भी पहले बयाना लेकर भरोसा तोड़ा था। दोनों का झूठ अलग था, पर दोनों की वजह दोस्ती भी थी और डर भी।

“दीपक, इस फैसले पर दोनों की मंजूरी जरूरी है,” उसने धीमी आवाज में कहा। “यह मामला सिर्फ तेरे कर्ज का नहीं है; इसमें मेरे अब्बा की छोड़ी हुई विरासत और हमारी साझी दुकान भी जुड़ी है। मैं तुझे रोकूंगा नहीं, लेकिन अगर तू मुझसे छिपाकर यह सौदा कर देगा, तो मैं भी तेरे साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा।”

और अगर बीस साल की दोस्ती बच गई, पर स्वाद बिक गया, या स्वाद बच गया और दोस्ती दरक गई, तब असल में क्या बचा?

आपको क्या लगता है, आखिर जीता कौन? कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए।

यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसमें आए सभी पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।

लेखक: Bhanu Pratap Singh

आखिरी बस से पहले दो प्रेमियों ने एक-दूसरे से एक ही झूठ बोला

रात के सुनसान बस अड्डे पर पीली रोशनी के नीचे एक लड़का और एक लड़की आमने-सामने खड़े हैं

आखिरी बस से पहले दो प्रेमियों ने एक-दूसरे से एक ही झूठ बोला

जो आदमी आया ही नहीं

रायपुर के पुराने बस अड्डे की घड़ी में साढ़े दस बजे थे और ओमकार अब तक नहीं आया था।

तनुजा साहू ने कंधे का बैग दोनों हाथों से सीने से चिपका रखा था। बैग में दो जोड़ी कपड़े थे, मां की दी हुई एक पतली चांदी की पायल थी, और सबसे नीचे एक सफेद लिफाफा था, जिसे उसने तीन हफ्ते से किसी को नहीं दिखाया था। ओमकार को भी नहीं।


तीन साल में ओमकार एक बार भी देर से नहीं आया था। वह मोबाइल रिपेयर की दुकान वाला लड़का था। हर काम की घड़ी बांधकर चलता था, क्योंकि उसके पास दूसरों की घड़ियों से ज्यादा अपनी घड़ी की चिंता थी।


तनुजा ने फिर फोन मिलाया। "आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अभी बंद है।"


उसने दुपट्टे का कोना उंगली पर लपेटा और खोल दिया। बचपन की आदत थी। डर लगता तो वह यही करती थी।


बंद शटर, खुला दराज


ग्यारह बजे तक उसका सब्र टूट गया। वह रिक्शा लेकर गुढ़ियारी की उस गली में पहुंची जहां ओमकार की दुकान थी।


शटर आधा गिरा हुआ था। नीचे से पीली रोशनी की एक पतली लकीर बाहर आ रही थी। भीतर कोई था।


पहला शक


तनुजा झुककर अंदर गई। काउंटर पर सोल्डरिंग आयरन ठंडा पड़ा था। उसके पास तीन खुले फोन रखे थे और बीच में ओमकार का अपना फोन, जिसकी स्क्रीन जल रही थी। बंद नहीं था, बस साइलेंट पर था।


स्क्रीन पर एक संदेश चमका। भेजने वाली का नाम था "पिंकी दीदी"।


“आज की रात का इंतज़ाम हो चुका है। उसे भनक तक नहीं लगेगी, तू बिल्कुल चिंता मत कर।”

तनुजा के कान में अपनी ही धड़कन की आवाज गूंजने लगी।


कौन नहीं जान पाएगी? और कौन-सी सीट?


उसे याद आया कि पिछले एक महीने से ओमकार कुछ बदला हुआ था। उसकी बात-बात पर हंसने की आदत और बढ़ गई थी। वह हंसी तब आती थी जब वह कोई बात टालना चाहता था। उसने तीन बार पूछा था, "तुम्हारे नतीजे की तारीख क्या थी, तनु?" और तीनों ही बार तनुजा का जवाब एक ही था, “वह अभी तक नहीं पहुँचा है।”


उसकी उंगलियां कांपीं। उसने दराज खींचा।


दराज में रखा कागज


दराज में ग्राहकों की रसीदें थीं, पुराने चार्जर थे, और ऊपर एक मुड़ा हुआ नीला कागज रखा था। बस का टिकट। रायपुर से जगदलपुर, कल सुबह छह बजे की बस, एक यात्री, सीट नंबर चौदह। यात्री का नाम पढ़ते ही तनुजा के हाथ से कागज छूट गया।


नाम उसका अपना था। "तनुजा साहू।"


तभी पीछे से आवाज आई। "तुम यहां क्या कर रही हो?"


दो सच, एक रात


ओमकार दरवाजे पर खड़ा था। उसके हाथ में चाय के दो कुल्हड़ थे और बालों में बारिश की बूंदें। वह हंस रहा था। फिर उसकी नजर नीले टिकट पर पड़ी और हंसी रुक गई।


"यह मेरे लिए है," तनुजा ने टिकट उठाकर कहा। उसकी आवाज अपने ही कानों को अजनबी लगी। "जगदलपुर के लिए। तुम्हें किसने बताया?"


"किसने क्या बताना था," ओमकार ने कुल्हड़ काउंटर पर रखा। "तुम्हारे बैग से लिफाफा गिरा था मेडिकल स्टोर में, उस दिन जब तुम पानी लेने गई थीं। मैंने सिर्फ ऊपर का नाम देखा। राज्य सेवा परीक्षा, चयन सूचना।"


तनुजा कुछ बोल नहीं पाई।

“तनु, तीन हफ्ते बीत चुके हैं। तुमने कुछ नहीं बताया, लेकिन अब मैं सब समझ चुका हूँ।”

"क्या समझ गए?"


"कि तुम्हें डर था। कि मैं रोकूंगा।" उसने नजर चुरा ली। "मैं रोकता भी, शायद। एक हफ्ता मैं यही सोचता रहा कि रोक लूं। फिर सोचा, जो लड़की रात-रात भर जागकर पढ़ी है, उसे एक दुकान वाले के साथ भागने की जगह उसकी कुर्सी पर बैठना चाहिए।"


"तो यह टिकट..."


"जगदलपुर में तुम्हारी जॉइनिंग परसों है। मेरी बहन पिंकी वहीं रहती है। उसी ने तुम्हारे रहने का इंतजाम किया है।" ओमकार ने गहरी सांस ली। "आज रात मैं तुमसे कहने आने वाला था कि मैं नहीं आ सकता। कि मेरा मन बदल गया। तुम नाराज होकर चली जातीं तो आसान रहता।"


लिफाफे का दूसरा हिस्सा


तनुजा हंस पड़ी, पर वह हंसी नहीं थी। उसने बैग खोलकर सफेद लिफाफा निकाला और काउंटर पर रख दिया।


“ओमकार, मैंने भी मन ही मन यही फैसला कर लिया था।”


ओमकार ने लिफाफा खोला। भीतर नियुक्ति पत्र की प्रति थी, और उसके पीछे एक सादा कागज जिस पर तनुजा की लिखावट में एक अधूरा पत्र था। "सेवा में, जिला कार्यालय... मैं व्यक्तिगत कारणों से यह पद स्वीकार करने में असमर्थ हूं..."


नीचे हस्ताक्षर की जगह खाली थी।

“मैं आज रात तुम्हारे साथ अंबिकापुर निकल जाती,” तनुजा ने धीमे स्वर में कहा। “रास्ते में ही तुम्हें बता देती कि मैंने नौकरी छोड़ दी है। तब तक तुम्हारे लिए वापस लौटना संभव नहीं होता।” उसने अपनी आँखों से आँसू पोंछे। “तुमने ही तो कहा था कि दुकान चलाने वाले लड़के को सरकारी नौकरी करने वाली लड़की नहीं मिलती। मैं बस तुम्हारी उस बात को गलत साबित करना चाहती थी।”

कुछ देर दुकान में सिर्फ बाहर की बारिश की आवाज रही।


"हम दोनों ने एक-दूसरे को बचाने के लिए एक-दूसरे से झूठ बोला," ओमकार ने धीरे से कहा।


"और दोनों ने सोचा कि सामने वाला कुछ नहीं जान पाएगा," तनुजा बोली।


सुबह छह बजे की बस


अगली सुबह रायपुर के बस अड्डे पर कोहरा था। पांच बजकर पचास मिनट पर जगदलपुर वाली बस ने हॉर्न दिया।


तनुजा प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। एक हाथ में नीला टिकट था, दूसरे में वह अधूरा पत्र। ओमकार उससे दो कदम दूर था। उसके हाथ खाली थे।


"मैंने रात भर कुछ तय नहीं किया," तनुजा ने कहा। "तुम भी मत करना। आज पहली बार मैं किसी का फैसला अपने हाथ में नहीं ले रही।"

“अब फैसला तुम्हें ही करना है,” ओमकार ने कहा। “इस बार मैं कोई बहाना नहीं बनाऊँगा और न ही यह कहूँगा कि मैं आ नहीं सकता। मैं सिर्फ इतना वादा कर सकता हूँ कि तुम्हारा जो भी निर्णय होगा, मैं तुम्हारा इंतज़ार यहीं करूँगा—चाहे तुम आज लौटो या चार साल बाद।”

कंडक्टर ने आखिरी आवाज लगाई। तनुजा ने टिकट देखा, फिर पत्र देखा। दोनों कागज उसकी उंगलियों में हल्के-हल्के हिल रहे थे।


उसने एक पल ओमकार की आंखों में देखा। फिर किसी ने भी कुछ नहीं कहा।


बस धीरे-धीरे आगे बढ़ी। खिड़की वाली सीट पर एक हाथ बाहर निकला हुआ था। प्लेटफॉर्म पर एक लड़का उस हाथ के साथ-साथ चलने लगा, पहले कदमों से, फिर तेज कदमों से।


कोहरे में अब कुछ साफ नहीं दिख रहा था।


आखिर जीता कौन?


तनुजा ने अपना सपना बचाने की कोशिश की, या ओमकार का सहारा? ओमकार ने तनुजा को आजाद किया, या अपने डर के आगे हार मान ली?


दोनों ने झूठ बोला, और दोनों के झूठ में एक ही सच छिपा था। पर उस सच ने दोनों को आखिर क्या दिया?


अगर तनुजा बस में बैठी रही, तो क्या जीता वह सपना जिसके लिए उसने रातें जगाईं? अगर वह कूदकर उतर गई, तो क्या जीता वह प्यार जिसके लिए उसने सब कुछ दांव पर लगा दिया था? और अगर बस चली गई और ओमकार अकेला खड़ा रह गया, तो क्या उसने सच में कुछ हारा?


आपको क्या लगता है, आखिर जीता कौन? कमेंट में बताइए।


यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसमें आए सभी पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।


लेखक: Bhanu Pratap Singh