गंगा आरती की आखिरी घंटी से पहले प्रेमी को मिली गुमनाम धमकी भरी चिट्ठी
सीढ़ियों के नीचे छिपा लिफाफा
मेहक तिवारी हर शाम दशाश्वमेध घाट की आरती के ठीक बाद, जब दीयों की आंच सबसे तेज होती और भीड़ सबसे घनी, अपनी पूजा की थाली वहीं एक कोने में रखती और पांच मिनट के लिए गायब हो जाती। उसके पिता, घाट के वरिष्ठ पुजारी रामेश्वर तिवारी, कभी इन पांच मिनटों पर सवाल नहीं उठाते, क्योंकि वह उन्हें "गंगा मैया से अकेले बात करने" का वक्त समझते थे।
असल में मेहक उन पांच मिनटों में सीढ़ियों के सबसे निचले कोने तक उतरती, जहां देवराज निषाद की नाव बंधी रहती थी।
उस शाम, जैसे ही वह नीचे पहुंची, देवराज की जगह नाव में सिर्फ एक मुड़ा हुआ लिफाफा मिला, पत्थर के नीचे दबा हुआ।
अंदर एक धमकी भरा संदेश था:
“आज रात यहां से निकलने की कोशिश मत करना। अगर तुमने ऐसा किया, तो सुबह होने से पहले मेरे पास मौजूद सारी तस्वीरें पूरे घाट की दीवारों पर दिखाई देंगी।”
कोई नाम नहीं था।
भागने की योजना
पिछले तीन महीने से मेहक और देवराज की यही योजना थी। मेहक का विवाह अगले महीने ठेकेदार सूरजभान सिंह के बेटे से तय होने वाला था, एक ऐसा रिश्ता जो मेहक के पिता के लिए घाट की राजनीति में फायदे का सौदा था। सूरजभान सिंह के पास आधे शहर के ठेके थे, और पुजारी परिवार से रिश्ता जुड़ने से उसकी साख और बढ़नी थी।
मेहक और देवराज ने तय किया था, विवाह की बात पक्की होने से एक रात पहले, यानी आज रात, वे दोनों पड़ोसी शहर जाने वाली आखिरी नाव से निकल जाएंगे।
अब यह लिफाफा उस योजना के ठीक बीचोंबीच आ गिरा था।
पहला शक
मेहक का दिल धक-धक करने लगा। उसने इधर-उधर देखा। घाट की सीढ़ियों पर भीड़ अब भी थी, कोई एक चेहरा अलग से पहचान में नहीं आ रहा था।
उसे सबसे पहले सूरजभान सिंह का नाम सूझा। अगर उसे पता चल गया होता, तो वह सीधे धमकी देता, छिपकर खत नहीं भेजता। यह तरीका बहुत नपा-तुला था, बहुत सावधान।
दूसरा नाम दिमाग में आया, उसका अपना बड़ा भाई, विनय। पिछले हफ्ते उसने मेहक को देवराज के साथ पुल के पास देखा था, और उस रात घर में दोनों के बीच कुछ कहा-सुनी भी हुई थी।
पर विनय ऐसा क्यों करेगा?
देवराज कहां है
मेहक ने घाट की हर गली में देवराज को ढूंढा। उसकी नाव वहीं बंधी थी, चप्पू अंदर रखे, पर देवराज कहीं नहीं था। यह उसकी आदत के खिलाफ था। वह हमेशा वक्त से पहले आकर इंतजार करता था।
उसने नाविकों के अड्डे पर पूछा। एक बूढ़े मल्लाह ने बताया, "वह तो शाम को यहीं था, फिर कोई आदमी आया, कुछ बात हुई, और वह उसके साथ चला गया। अंधेरे कपड़ों में था, चेहरा ठीक से नहीं दिखा।"
मेहक की सांसें तेज हो गईं। उसने अपना फोन निकाला। देवराज का नंबर मिलाया। घंटी बजती रही, कोई जवाब नहीं आया।
पुरानी गली में रोशनी
मेहक ने हिम्मत जुटाकर घाट के पीछे की पुरानी गलियों की तरफ कदम बढ़ाए, जहां शाम ढलते ही ज्यादातर दुकानें बंद हो जाती थीं। एक पुरानी हवेली के पास उसे हल्की रोशनी दिखी।
अंदर झांकने पर उसने देवराज को एक कुर्सी पर बैठा देखा, सामने खड़ा था उसका अपना भाई विनय।
मेहक का गला सूख गया। उसने दरवाजा धक्का देकर खोल दिया।
"विनय भैया, यह क्या कर रहे हो?"
भाई की सच्चाई
विनय ने पलटकर देखा। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं, थकान थी।
"बैठ, मेहक। मैं समझाता हूं।"
"तुमने ही खत भेजा था?"
विनय ने सिर हिलाया। "हां, मैंने भेजा था। पर तस्वीरें झूठी धमकी थीं। मेरे पास कोई तस्वीर नहीं है।"
"फिर क्यों?"
जो विनय ने छिपाया था
विनय ने गहरी सांस ली। "तीन दिन पहले मैंने सूरजभान सिंह के आदमियों की बात सुनी। वे जानते हैं, मेहक। उन्हें पता चल गया है कि तुम दोनों मिलते हो। वे आज रात नाव के पास घात लगाए बैठे होंगे, तुम्हें रोकने के लिए नहीं, देवराज को सबक सिखाने के लिए। सूरजभान का बेटा नहीं चाहता कि शादी से पहले शहर में उसकी बेइज्जती की कोई कहानी फैले।"
देवराज ने पहली बार मुंह खोला। "मुझे विनय ने आज शाम रोका। कहा, सीधे नाव पर मत जाना, पहले उससे मिलना। मैं मान गया, क्योंकि उसकी आवाज में सच में डर था।"
"तो चिट्ठी?" मेहक ने पूछा, आंखों में आंसू।
“मैं चाहता था कि धमकी पढ़कर तुम आज रात नाव की तरफ कदम ही न बढ़ाओ,” विनय ने धीरे से कहा। “मुझे पहले से अंदाजा था कि सिर्फ मेरे कहने से तुम अपना फैसला नहीं बदलोगी। इसलिए मैंने सोचा, अगर तुम्हारे मन में डर बैठा दूं, तो शायद तुम वहीं रुक जाओगी।”
फैसले की घड़ी
मेहक कुर्सी पर बैठ गई, हाथ कांप रहे थे। "तो अब क्या करें?"
विनय ने जेब से एक और कागज निकाला, रेलवे का टिकट। "यह असली रास्ता है। नाव पर मत जाना, वहां खतरा है। आज रात की आखिरी ट्रेन से निकल जाओ, स्टेशन के पीछे वाले रास्ते से। मैंने पहले ही टिकट ले लिए हैं।"
"तुम हमारी मदद कर रहे हो?" मेहक को यकीन नहीं हो रहा था।
"मैं तुम्हारा भाई हूं, मेहक। मुझे यह रिश्ता भी पसंद नहीं था, शुरू में। पर एक बेइज्जत करने वाले ठेकेदार के घर भेजने से बेहतर है कि तू उस आदमी के साथ जाए, जिसकी आंखों में तेरे लिए सच्ची फिक्र दिखती है।"
बाहर घड़ी में साढ़े नौ बज रहे थे। आखिरी ट्रेन दस बजकर पांच मिनट पर थी।
स्टेशन की तरफ दौड़
तीनों अंधेरी गलियों से होते हुए स्टेशन की तरफ भागे। रास्ते में एक मोड़ पर मेहक को दूर से सूरजभान सिंह के दो आदमी खड़े दिखे, घाट की तरफ जाने वाले रास्ते पर नजर गड़ाए।
विनय ने इशारे से दोनों को रुकने को कहा और खुद दूसरी तरफ से घूमकर एक पुराना रास्ता दिखाया, जो सीधे प्लेटफॉर्म के पिछले गेट तक जाता था।
ट्रेन की सीटी सुनाई दी। मेहक और देवराज भागते हुए प्लेटफॉर्म पर पहुंचे, ठीक तभी जब ट्रेन धीरे-धीरे सरकने लगी थी।
आखिर जीता कौन?
मेहक ने अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर अपना प्यार चुना। विनय ने अपनी बहन को बचाने के लिए झूठी धमकी का सहारा लिया, एक ऐसा झूठ जो किसी को चोट पहुंचाने के लिए नहीं, बचाने के लिए बोला गया था। और देवराज ने एक अनजान आदमी, विनय पर भरोसा करके अपनी जान का जोखिम उठाया।
अगर ट्रेन छूट जाती, तो क्या जीतता सूरजभान सिंह का रुतबा? अगर मेहक रुक जाती, तो क्या जीतती पिता की इज्जत, या हार जाता उसका अपना सपना? और विनय, जिसने झूठ बोलकर भी सच की रक्षा की, क्या वह जीता या हारा?
घाट पर आरती की आखिरी घंटी बज चुकी थी, और गंगा की धारा अपने उसी पुराने रास्ते पर बहती रही, जैसे उसे पहले से पता हो कि फैसला किसका होगा।
आपको क्या लगता है, आखिर जीता कौन? कमेंट में जरूर बताइए।
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसमें आए सभी पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।
लेखक: Bhanu Pratap Singh
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
क्या यह हिंदी सस्पेंस लव स्टोरी किसी सच्ची घटना पर आधारित है?
नहीं, यह पूरी तरह काल्पनिक इमोशनल कहानी है। पात्र, घाट, और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।
इस कहानी का सही अंत क्या है?
"आखिर जीता कौन?" सीरीज की तरह इस कहानी का अंत भी जानबूझकर खुला रखा गया है, ताकि पाठक खुद तय कर सकें कि असली जीत किसकी हुई।
Whowon.in पर और कैसी ट्विस्ट एंडिंग वाली प्रेम कहानियां मिलेंगी?
Whowon.in की "दो प्रेमी" कैटेगरी में नियमित रूप से नई सस्पेंस और इमोशन से भरी प्रेम कहानियां जोड़ी जाती हैं, जहां हर कहानी का अंत पाठक के अपने नजरिए पर छोड़ा जाता है।
क्या इस कहानी में कोई असली जगह या व्यक्ति दिखाया गया है?
नहीं, वाराणसी के घाट का जिक्र सिर्फ कहानी के माहौल के लिए काल्पनिक रूप में किया गया है, किसी वास्तविक व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है।





