सौदे की सुबह पुरानी विधि की डायरी गायब थी, और चाबी सिर्फ दो दोस्तों के पास थी
खाली जगह पर रखा चाय का गिलास
सुबह चार बजे दीपक वर्मा ने दुकान का ताला खोला और सीधे चूल्हे के पास वाली अलमारी की ओर गया। लाल जिल्द वाली डायरी हर रात वहीं रखी रहती थी, पुराने मर्तबान के पीछे। आज वहां सिर्फ गोल निशान था, जहां मर्तबान का तला धूल में बैठा था।
दीपक ने अलमारी के हर खाने में हाथ डाला। फिर पीछे की दीवार टटोली। फिर बैठ गया।
उसी डायरी में चालीस साल पुरानी जलेबी की विधि लिखी थी। उसी विधि के सौदे के कागज पर आज सुबह दस बजे दस्तखत होने थे। एक बड़ी मिठाई कंपनी का आदमी नौ बजे दुकान पर आने वाला था।
ताला टूटा नहीं था। खिड़की की जाली अपनी जगह थी। दुकान की चाबियां दो ही थीं। एक उसकी जेब में थी, और दूसरी इरफान के पास।
दीपक ने घबराहट में फोन उठाया और इरफान का नंबर डायल किया। कुछ ही देर बाद दूसरी तरफ से उनींदी आवाज सुनाई दी, “इतनी सुबह फोन क्यों किया? सब ठीक तो है?”
"जल्दी आ," दीपक ने कहा। "डायरी नहीं है।"
फोन के उस पार कुछ पल खामोशी रही। फिर इरफान बोला, "आ रहा हूं।"
पुराने दोस्त, नया सन्नाटा
इरफान अंसारी पैंतालीस मिनट बाद पहुंचा। बाल बिखरे थे, कमीज की एक बांह उल्टी मुड़ी हुई थी। वह सीधा अलमारी तक गया और खाली गोले को देर तक देखता रहा।
पहली पूछताछ
"तूने रात को ताला लगाया था?" इरफान ने पूछा।
"हाँ, मैंने ही लगाया था। ठीक आठ बजे। तुम खुद भी तो वहीं मौजूद थे।"
"लेकिन मैं तो साढ़े आठ बजे वहाँ से निकला था। मेरे जाने के बाद क्या हुआ?"
"उसके बाद मैं सीधा घर गया। अम्मा से पूछ ले।" दीपक की आवाज ऊंची हो गई। "पर मुझे यह बता, इरफान, चाबी तेरे पास भी तो है।"
इरफान ने उसकी ओर देखा। वह कम बोलने वाला आदमी था। गुस्सा आता तो और चुप हो जाता, और उसकी यही चुप्पी दीपक को हमेशा से सबसे ज्यादा चुभती थी।
"तू मुझ पर शक कर रहा है।"
"मैं सिर्फ पूछ रहा हूं।"
"हद है यार! हमारी बीस साल पुरानी दोस्ती के बाद भी आज तुझे मुझ पर यह शक हो रहा है?"
बाहर गली में पहली साइकिल की घंटी बजी। दुकान के भीतर दोनों आदमी एक-दूसरे के सामने खड़े थे, और बीच में चूल्हे की ठंडी राख थी।
जो दीपक ने देखा
दीपक की नजर इरफान के हाथों पर गई। दाएं हाथ की उंगलियों पर हल्की चिकनाई थी, जैसे किसी ने अभी-अभी तेल लगाया हो। दीपक को याद आया कि पिछले हफ्ते ही पीछे के दरवाजे की कुंडी चरमराने लगी थी। उसने उसे ठीक करने की बात कही थी, पर इरफान ने कहा था, "मैं देख लूंगा।"
दीपक ने कुंडी को छुआ। उंगली पर काला तेल चढ़ गया। ताजा तेल।
"कुंडी में तेल किसने डाला?"
इरफान ने एक पल को आंखें बंद कीं। "मैंने। कल शाम।"
"कल शाम तो वह चरमरा रही थी, इरफान। मैंने खुद सुना था।"
"तो मैंने रात को डाला होगा।" उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि सुनाई मुश्किल से दी।
सौदे से पहले की सच्चाई
आठ बज चुके थे। गली में दुकानें खुलने लगी थीं। दीपक ने चाय के दो गिलास भरे, पर किसी ने उन्हें छुआ नहीं।
"इरफान," उसने कहा, "तू नहीं चाहता था कि यह सौदा हो।"
"हां, नहीं चाहता था।"
"तूने कहा था तू मान गया।"
"मैंने कहा था कि तुझे जो ठीक लगे, कर। मान जाना और राजी होना अलग बातें हैं, दीपक।" इरफान ने पहली बार उसकी आंखों में सीधे देखा। "यह विधि मेरे अब्बा की लिखाई में है। उन्होंने चालीस साल कढ़ाई के सामने खड़े होकर यह स्वाद बनाया था। तू इसे कागज पर बिकने वाली चीज समझता है।"
"क्योंकि मेरे पास तेरे जैसी भावनाओं का बैंक नहीं है," दीपक ने तीखा जवाब दिया। "मेरे ऊपर छह लाख का कर्ज है। मेरी बहन की शादी अगले साल है। यह दुकान दो आदमियों का पेट भरती है, पर तीन परिवारों का बोझ नहीं उठाती।"
"तो तूने मुझे बताया क्यों नहीं?"
"क्या बताता?"
"कि तूने पहले ही कंपनी से बयाना ले लिया है।"
दीपक का चेहरा सफेद पड़ गया।
कमीज की जेब का कागज
"तेईस हजार का," इरफान ने कहा। उसकी आवाज अब भी शांत थी। "बैंक की पर्ची तेरी पुरानी कमीज में थी, जो पिछले सोमवार इस्त्री के लिए मेरे घर आई थी। मैंने तब कुछ नहीं कहा। सोचा, तू खुद बताएगा। तू नहीं बताएगा, यह मुझे कल रात समझ आया।"
"तो तूने डायरी उठा ली?"
इरफान चुप रहा।
"जवाब दे!"
"मैंने उठाई है," इरफान ने कहा।
चूल्हे की राख में कुछ हिला। शायद हवा थी।
डायरी कहां है
"कहां है वह?" दीपक की आवाज फट गई। उसने इरफान का कॉलर पकड़ लिया। इरफान ने हटाया नहीं, बस उसकी आंखों में देखता रहा।
“अगर मुझे खत्म करना ही है, तो कर दे,” उसने शांत स्वर में कहा। “डायरी तुझे वापस मिल जाएगी। लेकिन उससे पहले मेरी एक बात सुन ले। मैं रात में डायरी चुराकर छिपाने नहीं गया था। मैं तो उसे पढ़ना चाहता था—अब्बा के अपने हाथों से लिखे उन शब्दों को, बस एक आखिरी बार।”
दीपक की पकड़ अचानक कमजोर पड़ गई।
“डायरी पढ़ते-पढ़ते मैं उसके आखिरी हिस्से तक पहुंच गया। वहां एक ऐसी बात दर्ज थी, जिसके बारे में हम दोनों को कभी पता ही नहीं चला। वह पन्ना जिल्द के अंदर चिपका हुआ था, इसलिए हमारी नजर उस पर कभी नहीं पड़ी। रात में मैंने बड़ी सावधानी से उसे अलग किया और खोलकर पढ़ा।”
इरफान ने अपनी जेब से लाल जिल्द वाली डायरी निकाली। उसके कोने घिसे हुए थे, और जिल्द के भीतर का चिपका हुआ पन्ना हल्का फटकर उठा हुआ था।
"पढ़," उसने कहा।
दीपक ने डायरी हाथ में ली। आखिरी पन्ने पर पतले नीले अक्षर थे, जो कई साल की स्याही में धुंधले पड़ चुके थे।
"बेचना पड़े तो बेच देना, पर किसी एक के दस्तखत से मत बेचना। जिस दिन विधि दो हाथों की जगह एक हाथ से बिके, उस दिन समझ लेना कि स्वाद गया।"
दीपक ने उसे दो बार पढ़ा। उसके होंठ सूख गए।
“आखिर यह बात लिखी कब गई थी?”
इरफान ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “अब्बा को पहले से अंदाजा था कि किसी दिन हम दोनों के सामने यही सवाल खड़ा होगा। हो सकता है, उन्होंने तेरे पापा से भी उस वक्त यही बात कही हो।”
नौ बजे का मेहमान
नौ बजते ही गली में कार का हॉर्न सुनाई दिया। कंपनी का आदमी, ब्रीफकेस और मुस्कान लिए, दुकान की दहलीज पर खड़ा था।
"नमस्ते भाई साहब! सब तैयार?"
दोनों दोस्त एक साथ उसकी ओर मुड़े। चूल्हे के पास रखी मेज पर कागज बिछे थे। दीपक के हाथ में डायरी थी, इरफान के हाथ में कलम।
"बयाना तो हम ले ही चुके हैं," कंपनी वाले ने कहा, "आज बस दस्तखत हो जाएं।"
दीपक ने इरफान की ओर देखा। इरफान की उंगलियां कलम पर थीं, पर उसने उसे आगे नहीं बढ़ाया।
"दो दस्तखत चाहिए, दीपक," उसने धीमे से कहा। "यह तेरा कर्ज है, मेरी अब्बा की विरासत है, और हम दोनों की दुकान है। मैं तुझे मना नहीं करूंगा। पर मैं तेरे लिए भी सही नहीं करूंगा, अगर तू मुझे बिना बताए यह सौदा कर ले।"
दीपक का मन अब भी भीतर से दो हिस्सों में बंटा था। एक हिस्सा छह लाख के कर्ज को गिन रहा था। दूसरा हिस्सा अपने पिता की पुरानी साइकिल को याद कर रहा था, जो हर सुबह इसी दुकान के बाहर खड़ी होती थी।
उसने कलम उठाई। कागज पर कलम की नोक टिकी। बाहर गली में किसी ने कढ़ाई में पहली जलेबी डाली। पुराने तेल की महक दुकान में भर गई।
आखिर जीता कौन?
इरफान ने डायरी चुराई, यह सच है। पर दीपक ने भी पहले बयाना लेकर भरोसा तोड़ा था। दोनों का झूठ अलग था, पर दोनों की वजह दोस्ती भी थी और डर भी।
“दीपक, इस फैसले पर दोनों की मंजूरी जरूरी है,” उसने धीमी आवाज में कहा। “यह मामला सिर्फ तेरे कर्ज का नहीं है; इसमें मेरे अब्बा की छोड़ी हुई विरासत और हमारी साझी दुकान भी जुड़ी है। मैं तुझे रोकूंगा नहीं, लेकिन अगर तू मुझसे छिपाकर यह सौदा कर देगा, तो मैं भी तेरे साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा।”
और अगर बीस साल की दोस्ती बच गई, पर स्वाद बिक गया, या स्वाद बच गया और दोस्ती दरक गई, तब असल में क्या बचा?
आपको क्या लगता है, आखिर जीता कौन? कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए।
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है। इसमें आए सभी पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं।
लेखक: Bhanu Pratap Singh

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